एक भ्रमर की यात्रा
: चतुरानन झा 'मनोज'

खिन्न हो गया जी उसका
हो गया निराश
कुछ न बोला, कुछ न बोला
कुछ न बोला अपनी धुन में बस यही गाता रहा
ये कौन सा रिश्ता है?
उड़ चला वह वहाँ से भी
मधु की तलाश में
उड़ता ही रहा
सचमुच जवाब दे दिया था
उसके पंखों ने
तलमलाकर गिर पड़ा
एक सड़क के किनारे-
दम घुट रहा था उसका
धुएँ से, शोर से, प्रदूषण से।
वह षट्पद अपने नन्हें पैरों से
रेंगने लगा
जा पहुँचा पास ही बहती नाली के समीप
नाली के ही नर्दम जल से पोषण पा
जी रहा था एक पौधा भी वहीं
एक पुष्प भी खिला हुआ था
उस पौधे पर
पौधे की कमज़ोर तने से ऊपर वह लगा रेंगने
जा पहुँचा उस पुष्प तक
उस अधोमुखी मृतप्राय फूल
को लगा चूसने वह भ्रमर
कि शायद मधु मिल जाए

मैंने देखा-
पास ही पत्थर तोड़ती मजदूरनी
के झूले हुए स्तन से
कुपोषण का शिकार एक शिशु
चूस रहा था प्राण।
मैंने देखा-
पश्चिम दिशा में सूर्य ने
मूँद ली अपनी आँखें
और अस्त हुआ ...
छाने लगा अँधेरा।